प्रेगनेंसी में किये जाने वाला डबल मार्कर टेस्ट क्या है

By | April 24, 2021

यदि कोई महिला गर्भावस्था के दौरान चिकित्सक के पास जाती है तो चिकित्सक उसके गर्भावस्था के दौरान कई प्रकार के टेस्ट करवाते हैं । इन टेस्ट में एक टेस्ट होता है डबल मार्कर टेस्ट

डबल मार्कर टेस्ट गर्भावस्था के दौरान किया जाने वाला एक टेस्ट होता है जो गर्भ में पल रहे बच्चे के क्रोमोसोम अर्थात गुणसूत्र के बारे में जानकारी प्रदान करता है । यह टेस्ट गर्भावस्था की प्रारंभिक अवस्था में किया जाता है ताकि यह पता चल सके कि गर्भ में पल रहे शिशु में आगे चलकर कोई गंभीर विकृति या रोग तो उत्पन्न नहीं होगा ।

यह टेस्ट गर्भ में पल रहे शिशु के गुणसूत्र के विकास में आने वाली किसी भी प्रकार की समस्या की जांच के लिए किया जाता है । आप जानते ही होंगे कि बच्चे के गुणसूत्र ही बच्चे के विभिन्न प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक गुणों अथवा विशेषताओं के लिए जिम्मेदार होते हैं ।

यदि किसी बच्चे के गुणसूत्र में किसी भी प्रकार की कोई समस्या हो तो आगे चलकर यह एक गंभीर स्थिति उत्पन्न कर सकती हैं । डबल मार्कर टेस्ट बताता है की बच्चे के गुणसूत्र में कोई समस्या है या नहीं जिससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आगे चलकर बच्चे का संपूर्ण विकास होगा तथा बच्चा बिल्कुल स्वस्थ तथा हष्ट पुष्ट पैदा होगा ।

डबल मार्कर टेस्ट करने पर कभी-कभी क्रोमोसोम में डाउन सिंड्रोम या एडवर्ड सिंड्रोम जैसी किसी विशेष प्रकार की विकृति पाई जा सकती है । यह विकृतियां आगे चलकर गंभीर परिणाम देती हैं इसलिए इस प्रकार के सिंड्रोम का पता चलने पर इनका इलाज किया जा सकता है ।

डबल मार्कर टेस्ट क्यों महत्वपूर्ण है

डबल मार्कर टेस्ट को इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यदि समय रहते विकृत क्रोमोसोम की पहचान ना हो तो आगे चलकर डाउन सिंड्रोम या एडवर्ड एडवर्ड सिंड्रोम के कारण बच्चे में गंभीर विकृतियां उत्पन्न हो सकती हैं । बच्चा मानसिक व शारीरिक रूप से विकलांग पैदा हो सकता है । इस टेस्ट को कराने के बाद यदि किसी भी प्रकार की कोई विकृति सामने आती है तो गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में ही गर्भपात कराया जा सकता है ।

डबल मार्कर टेस्ट से पहले किन बातों का ध्यान रखें

आपको पता होना चाहिए की डबल मार्कर टेस्ट के लिए आपके ब्लड सैंपल की जरूरत पड़ती है क्योंकि यह एक प्रकार का ब्लड टेस्ट है । यदि आपकी पिछले कुछ समय से कोई मेडिसिन चल रही है या आप किसी विशेष दवा का सेवन करते हैं तो आपको इस टेस्ट को कराने से पहले डॉक्टर को बता देना चाहिए । हो सकता है आपके डॉक्टर इन मेडिसिन को बंद कर दें ताकि टेस्ट के सही रिजल्ट मिल सके ।

डबल मार्कर टेस्ट कैसे किया जाता है?

डबल मार्कर टेस्ट एक प्रकार का ब्लड टेस्ट होता है तथा इस टेस्ट को करने के लिए गर्भवती महिला का ब्लड सैंपल लिया जाता है । गर्भावस्था के प्रारंभिक दिनों में गर्भवती महिला का अल्ट्रासाउंड भी किया जाता है उसी दौरान ब्लड सैंपल लेकर इस टेस्ट को किया जाता है ।

इस टेस्ट के दौरान ब्लड सैंपल में हार्मोन तथा प्रोटीन की जांच की जाती है तथा पता लगाया जाता है कि गर्भवती महिला के गुणसूत्र में किसी प्रकार की कोई विसंगति तो नहीं है ।

इस टेस्ट का रिजल्ट नेगेटिव या पॉजिटिव आता है । पॉजिटिव आने पर माना जाता है की गर्भवती महिला के क्रोमोसोम में गड़बड़ी है जिससे डॉक्टर अगले ट्रीटमेंट की तैयारी करते हैं ।

डबल मार्कर टेस्ट के विभिन्न परिणाम क्या क्या होते हैं?

जैसा कि हमने आपको पर बताया डबल मार्कर टेस्ट या तो पॉजिटिव आता है या नेगेटिव । टेस्ट का नेगेटिव या पॉजिटिव आना कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे गर्भवती महिला की उम्र कितनी है, महिला का ब्लड कैसा है तथा महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण की उम्र कितनी है । इन सभी कारकों पर टेस्ट का रिजल्ट निर्भर करता है ।

विभिन्न अध्ययनों में यह पाया गया है कि जिन महिलाओं की उम्र 35 वर्ष या अधिक थी उनके गर्भ में पल रहे बच्चों का डबल मार्कर टेस्ट ज्यादातर पॉजिटिव आया था । अब हम यह जानते हैं टेस्ट पॉजिटिव या नेगेटिव किस प्रकार निर्धारित किया जाता है ।

इस टेस्ट के रिजल्ट अनुपात में दिए जाते हैं जैसे 1:50, 1:100, 1:500 इत्यादि । यदि इस टेस्ट का रिजल्ट 1:500 या उससे अधिक होता है तो टेस्ट नेगेटिव होता है, जबकि यदि यह अनुपात 1:250 या उससे कम हो तो इस पेस्ट को पॉजिटिव पाया जाता है । अब हम समझते हैं कि यहां अनुपात का क्या मतलब होता है ।

1:50 का मतलब होता है की उस महिला के द्वारा 50 गर्भाधान में से केवल 1 बच्चे में डिसऑर्डर होने की संभावना है जो कि बहुत ज्यादा है । इसी प्रकार 1:100 का मतलब होता है कि महिला के द्वारा सो गर्भधारण में से एक बच्चे में डिसऑर्डर होने की संभावना है, जबकि 1:500 का मतलब है कि महिला के द्वारा 500 गर्भधान में केवल 1 बच्चे में डिसऑर्डर होने की संभावना है ।

इस प्रकार 1:500 में रिस्क बहुत कम है इसलिए इसे निगेटिव माना जाता है, जबकि 1:10 से लेकर 1:250 तक रिस्क बहुत ज्यादा है इसलिए इस टेस्ट को पॉजिटिव माना जाता है ।

डबल मार्कर टेस्ट से संबंधित प्रश्न

डबल मार्कर टेस्ट कब किया जाता है?
डबल मार्कर टेस्ट गर्भाधान पता चलने के 3 महीने के भीतर किया जाता है ।

डबल मार्कर टेस्ट क्यों किया जाता है?
डबल मार्कर टेस्ट गर्भ में पल रहे बच्चे के क्रोमोसोम पर आधारित होता है जिसमें यह पता चलता है कि बच्चे में आने वाले समय में कोई गंभीर रोग तो उत्पन्न नहीं होगा ।

डबल मार्कर टेस्ट किस प्रकार का टेस्ट है?
डबल मार्कर टेस्ट एक ब्लड टेस्ट है इसके लिए ब्लड सैंपल लिया जाता है । ब्लड में हार्मोन तथा प्रोटीन की जांच की जाती है ।

क्या डबल मार्कर टेस्ट कराने के लिए खाली पेट जाना पड़ता है?
जी नहीं डबल मार्कर टेस्ट कराने के लिए आपको खाली पेट जाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह टेस्ट आपके ब्लड सैंपल पर आधारित होता है ।

डबल मार्कर टेस्ट रिजल्ट में लो रिस्क का क्या मतलब होता है?
जैसा कि हमने आपको पर बताया यदि डबल मार्कर टेस्ट का रिजल्ट 1:500 या उससे ज्यादा आए तो इसका मतलब होता है कि 500 बार गर्भधारण करने पर केवल एक बार ही बच्चे में समस्या पैदा हो सकती है, इस स्थिति में यह लो रिस्क माना जाता है ।

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